उत्तराखंड के चुनावों में परिवारवाद को अक्सर नहीं मिली कामयाबी
उत्तराखंड के चुनावी इतिहास पर नजर डालने वाले एक विश्लेषण का कहना है कि राज्य में परिवारवाद की राजनीति को अक्सर झटका लगा है। इसके मुताबिक जब भी किसी नेता के परिजन ने राजनीतिक विरासत संभालने के लिए चुनाव लड़ा, शुरुआत डगमगाती रही और कई जाने-माने परिवारों के सदस्यों को मतदाताओं ने पहले ही चुनाव में नकार दिया।
विश्लेषण का तर्क
विश्लेषण के अनुसार अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौर से लेकर अब तक के चुनावों में परिवार के सदस्यों को आगे बढ़ाने के प्रयोग होते रहे हैं। इनमें से ज्यादातर प्रयोग कांग्रेस की तरफ से हुए, लेकिन पहले चुनाव में ये खास असर नहीं छोड़ पाए। जो नेता राजनीतिक चुनौतियों में खरे उतरे, वे आगे बढ़े, जबकि बाकी राजनीति के हाशिये पर चले गए।
2014 के लोकसभा चुनाव के उदाहरण
- हरिद्वार: कांग्रेस ने यहां मुख्यमंत्री हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत को टिकट दिया था। यह वही सीट थी जिससे हरीश रावत सांसद थे, फिर भी रेणुका रावत को हार मिली।
- टिहरी: साकेत बहुगुणा, जो पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पुत्र हैं, यहां से चुनाव हार गए। विश्लेषण के मुताबिक इस हार के बाद वह मुख्यधारा की राजनीति में नजर नहीं आए।
विश्लेषण का निष्कर्ष है कि इन दोनों सीटों पर मतदाताओं ने बड़े नेताओं के परिजनों को स्वीकार नहीं किया।
आगे क्या हुआ
2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 57 और कांग्रेस ने 11 सीटें जीतीं। त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने।
यह भी देखें: उत्तराखंड विधानसभा सदस्य और राजनीतिक नेता
मूल रूप से 27 जनवरी 2017 को प्रकाशित। 9 अक्टूबर 2026 को नए सिरे से लिखा गया।
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