कर्नाटक चुनाव केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे, राज्य की चुनावी तस्वीर अस्पष्ट

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मतदान से 20 दिन पहले भी नतीजों का अनुमान लगाना कठिन बना हुआ है। बेंगलुरु से लिखे एक विश्लेषण के अनुसार कांग्रेस और भाजपा, दोनों का प्रदेश नेतृत्व अपने दम पर नैया पार लगाता नहीं दिखता और दारोमदार केंद्रीय नेताओं पर है। लेख में याद दिलाया गया कि चार-पांच महीने पहले गुजरात का नतीजा नजदीकी रहा था, पर विजेता को लेकर संशय नहीं था।
प्रचार की स्थिति
बीते एक महीने में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह छह बार राज्य का दौरा कर चुके हैं, जिनमें रैलियों के साथ कार्यकर्ता सम्मेलनों पर जोर रहा है। उधर राहुल गांधी भी कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर लगातार रैलियां कर रहे हैं। मंदिरों और मठों में जाना सभी दलों के प्रचार का हिस्सा बन गया है। नरेंद्र मोदी, जो भाजपा के सबसे बड़े प्रचारक हैं, की रैलियों की तारीखें अभी तय होनी हैं।
कांग्रेस की अंदरूनी चुनौतियां
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया चामुंडेश्वरी से लड़ रहे हैं, और विश्लेषण के अनुसार वे बादामी से भी नामांकन कर सकते हैं, इसलिए वहां अभी किसी अन्य उम्मीदवार को फॉर्म नहीं दिया गया। बगावत की आशंका के चलते पार्टी ने 14 को छोड़कर सभी पुराने विधायकों पर फिर भरोसा जताया, जबकि कई सीटों पर दूसरे दावेदार टिकट की उम्मीद लगाए बैठे थे। नाम न छापने की शर्त पर एक कांग्रेसी नेता ने सवाल उठाया, ‘साढ़े सात फीसदी वोट वाले सिद्धारमैया साढ़े 92 फीसदी का भविष्य तय करेंगे यह कितना उचित है।’ लेख का कहना है कि सिद्धारमैया ने लिंगायत कार्ड दबाव में खेला है।
भाजपा का पक्ष
विश्लेषण के मुताबिक वीरशैव और लिंगायत मतदाता, जो पहले येदियुरप्पा के साथ थे, मानते हैं कि यह कार्ड ज्यादा असरदार नहीं होगा और अंतिम फैसला केंद्र को करना है। भाजपा में भी असंतोष के स्वर हैं, लेकिन उन्हें संभालने का काम शीर्ष नेतृत्व कर रहा है।
आगे क्या हुआ
15 मई 2018 की मतगणना में भाजपा को 104, कांग्रेस को 78 और जेडी(एस) को 37 सीटें मिलीं। 23 मई 2018 को एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने।
मूल रूप से 20 अप्रैल 2018 को प्रकाशित। 9 अक्टूबर 2026 को नए सिरे से लिखा गया।
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