उपचुनाव में हार के बाद भाजपा पर NDA सहयोगियों का दबाव बढ़ा, कैराना हार की वजहें

लगातार उपचुनाव हारने के बाद भाजपा के सामने विपक्ष के साथ-साथ अपने सहयोगियों की ओर से भी चुनौती बढ़ती दिखी। रिपोर्ट के मुताबिक राजग के घटक दल इन नतीजों को अपनी उपयोगिता बढ़ने के मौके के तौर पर देख रहे थे, हालांकि वे तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद ही अपनी रणनीति तय करने वाले थे। भाजपा इन हारों को 2019 के चुनाव से जोड़कर नहीं देख रही थी, लेकिन सहयोगियों से संवाद तेज करने की तैयारी में थी।
सहयोगियों की बेचैनी
यह स्थिति सीधे तौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश से जुड़ी थी, जबकि महाराष्ट्र में भी इसकी संभावनाएं टटोली जा रही थीं। उत्तर प्रदेश में भारतीय समाज पार्टी और अपना दल जैसे दलों को आशंका थी कि इस बार उन्हें पिछली बार जितनी सीटें न मिलें। बिहार में जदयू के साथ आने के बाद सीट बंटवारे पर खींचतान तय मानी जा रही थी, क्योंकि 40 में से 30 सीटों पर पहले से पूर्ववर्ती राजग के सांसद थे और जदयू बड़ी हिस्सेदारी चाहता था।
भाजपा पर दबाव था कि और साथी अलग न हों। इसी वजह से उद्धव ठाकरे के एलान के बावजूद राज्य भाजपा नेतृत्व तीखी प्रतिक्रिया देने से बच रहा था। रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश से यह स्पष्ट हुआ था कि सबसे बड़ी पार्टी के बहुमत से दूर रहने पर चुनाव-पूर्व गठबंधन का दावा सबसे मजबूत होता है, इसलिए गठबंधन बचाना और बढ़ाना दोनों जरूरी माने गए। राजग के घटक दलों की बैठक जल्द बुलाए जाने की संभावना भी जताई गई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन तय करता कि सहयोगियों का रुख कितना बदलता है।
कैराना में हार के कारण
रिपोर्ट के अनुसार भाजपा को पहले से अंदाजा था कि कैराना हाथ से निकल रहा है, इसलिए वह रालोद प्रत्याशी की जीत का अंतर कम रखने में लगी रही। गन्ना किसानों की नाराजगी बड़ा कारण बनी: क्षेत्र की सबसे बड़ी शामली चीनी मिल से भुगतान लगभग नहीं हुआ और बकाया चुकाने की राज्य सरकार की कोशिशें नाकाम रहीं। विपक्ष ने रालोद के टिकट पर तबस्सुम हसन को उतारा, जिसकी काट भाजपा नहीं ढूंढ पाई।
2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद संसद और विधानमंडल में मुस्लिम नेताओं की गैरमौजूदगी का मुद्दा विपक्ष ने मतदाताओं के बीच प्रभावी ढंग से उठाया। सपा और बसपा प्रचार से दूर रहीं, जिससे मुस्लिम-जाट दूरी का दोष उन पर नहीं आया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर का विवाद भी रालोद ने भुनाया। रिपोर्ट के अनुसार 16 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में मुस्लिम मतदाता साढ़े पांच लाख, दलित पौने तीन लाख और जाट करीब दो लाख थे। साझा प्रत्याशी के कारण विपक्षी वोट नहीं बंटे, और स्थानीय नेताओं की अनदेखी भी पार्टी को महंगी पड़ी।
आगे क्या हुआ
बाद में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में 114, राजस्थान में 99 और छत्तीसगढ़ में 68 सीटें जीतकर तीनों राज्यों में सरकार बनाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 543 में से 303 सीटें मिलीं।
मूल रूप से 2 जून 2018 को प्रकाशित। 9 अक्टूबर 2026 को नए सिरे से लिखा गया।
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