सरकार अध्यादेश का मार्ग अपनाने से बचे
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संसद में अपने आखिरी भाषण के दौरान सरकार को अध्यादेश लाने से बचने की नसीहत देने में हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने कहा कि केवल बेहद जरूरी परिस्थितियों में ही अध्यादेश लाया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, वित्तीय मामलों में तो अध्यादेश का रास्ता बिल्कुल नहीं अपनाना चाहिए। राष्ट्रपति ने संसद में बिना चर्चा के ही विधेयक पारित करने पर चिंता जताते हुए कहा कि यह जनता काविश्वास तोड़ता है। वहीं हंगामे के कारण संसद के बाधित होने पर भी मुखर्जी ने बेबाक राय जाहिर करते हुए कहा कि इसकी वजह से सरकार से ज्यादा नुकसान विपक्ष का होता है।
रविवार को संसद के केंद्रीय कक्ष में भावपूर्ण विदाई समारोह के दौरान प्रणब मुखर्जी ने कहा कि संसद का सत्र नहीं चलने के दौरान तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कार्यपालिका को अध्यादेशों के जरिये कानून बनाने के असाधारण अधिकार दिए गए हैं। मगर उनका दृढ़ मत है कि अध्यादेश केवल बाध्यकारी परिस्थितियों में ही लाया जाना चाहिए। खासकर उन विषयों पर तो अध्यादेश बिल्कुल नहीं लाना चाहिए जिन पर संसद या संसदीय समिति विचार कर रही हो या जिन्हें संसद में पेश किया गया हो। उन्होंने बिना चर्चा के विधेयक पारित होने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की सलाह दी। कहा कि जब संसद कानून निर्माण की अपनी भूमिका निभाने में विफल हो जाती है या बिना चर्चा के कानून लागू करती है तो वह जनता द्वारा व्यक्त विश्वास को तोड़ती है। कानून बनाने से पहले व्यापक चर्चा होनी ही चाहिए।
उन्होंने कहा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष की बेंचों पर बैठकर बहस, परिचर्चा और असहमति के महत्व को उन्होंने बखूबी समझा है। इस अनुभव के आधार पर उनका साफ मानना है कि संसद में हंगामे से विपक्ष का ज्यादा नुकसान होता है क्योंकि इससे वह लोगों की चिंताओं को स्वर देने का अवसर खो देता है।
Source : Dainik Jagran
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